ki daamann-e-khyaal-e-yaar, choota jaye hai mujhse

करवटें बदल कर कोई कैसे रात गुजारता है
कोई ख्याल है, लिपटा हुआ होगा
करवट बदलते हैं, की ख्याल भी बदल जाये
कुछ भी नहीं बदलता

रात चुपचाप रहती है, डरा देती है
मुझे तुमसे रोज़ मिला देती है
जो गहरे काले धब्बे थे तुम्हारी आँखों के नीचे
जिन्हें मैं धुप छाँव कहता था
उन्हें तो तुम अब तक धुंधला चुकी होगी

जो खुरदरे मोड़ हैं इस राह में
तुम अगर जो मुड कर देख लेते
तुम मेरे साथ ही चलते
मेरी दायीं करवट मुझे तुम्हारे पास रखती
मेरी बायीं करवट में तुम मेरे पास होते

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4 thoughts on “ki daamann-e-khyaal-e-yaar, choota jaye hai mujhse

    • Thanks Rajita

      Title is a from a couplet of Ghalib-

      Sambhalne de mujhe, ae naaumeedee, kya qayamat hai
      ki daamann-e-khyaal-e-yaar, choota jaye hai mujhse

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