friday musing 2

कहते हैं इश्क नाम के गुजरे हैं एक बुज़ुर्ग
हम लोग भी मुरीद उसी सिलसिले के हैं

उसके लिए इश्क सबसे बड़ा था और जहाँ तक इश्क का सवाल है, अब्बास जानता था कि इश्क पोस्टल एड्रेस नहीं पूछता पर वह हमेशा ठीक पते पर पहुँच जाता है.

राही मासूम रज़ा
असंतोष के दिन

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4 thoughts on “friday musing 2

    1. हाँ रजिता 🙂 मुझे लगता है की पहुँचता तो है…कई दफा भेजने वाले टिकट लगाना भूल जाते होंगे और चिट्ठी बैरंग वापिस हो जाती होगी.. या सबकुछ ठीक होने के बावजूद पाने वाले मंज़ूर नहीं करते होंगे…

  1. Bhale hi bahot sare tedhe medhe raston se gujar ke; aakhir pahunch hi jaata hain 🙂
    and until it is not happy; it is not the end. So picture abhi baaki hain mere dost 😀

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