कितनी बार बिखरा हूँ
समेटना भी सीखा है
जो मैं था बिखरने से पहले
समेटे टुकडो में मैं वो नहीं हूँ
कोई सब टुकड़े चुने भी क्यूँ
क्यों न हम थोड़े अधूरे ही रहें
इस खालीपन ने सिखलाया है
पूरा देखना खुदको जरूरी नहीं
पूरा महसूस करना बेहतर है
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कितनी बार बिखरा हूँ
समेटना भी सीखा है
जो मैं था बिखरने से पहले
समेटे टुकडो में मैं वो नहीं हूँ
कोई सब टुकड़े चुने भी क्यूँ
क्यों न हम थोड़े अधूरे ही रहें
इस खालीपन ने सिखलाया है
पूरा देखना खुदको जरूरी नहीं
पूरा महसूस करना बेहतर है