ये जो आस पास का समय है
जहाँ कल आज को तो छु पाता है
ये जो आस पास का समय है
जहाँ मैं आने वाले कल का गवाह हूँ
आज आज में जमा है ज़िन्दगी
बीतता नहीं कल, जाता ही नहीं
एक कांच की दीवार के पार
पारभाषिक हैं सब, जिसकी तलाश है
एक सुबह, सब टूट के बिखरेगा
कैद से निकल, छु लूँगा बहती ज़िन्दगी को
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